प्रस्तावना:
विज्ञान ने मानव-जीवन को अभूतपूर्व सुविधाएँ प्रदान की हैं, परन्तु साथ ही इसके दुरुपयोग ने अनेक गम्भीर समस्याएँ भी उत्पन्न की हैं। यही विरोधाभास विज्ञान को 'वरदान' और 'अभिशाप' — दोनों रूपों में देखे जाने का आधार बनता है।
वरदान के रूप में विज्ञान:
चिकित्सा-क्षेत्र में असाध्य रोगों का उपचार, संचार-साधनों से दूरियों का सिमटना, कृषि में उत्पादन-वृद्धि, यातायात के तीव्र साधन तथा शिक्षा-सुलभता — इन सबने मानव-जीवन को सरल, सुखद और समृद्ध बनाया है। आज इण्टरनेट, चिकित्सा-तकनीक और ऊर्जा-स्रोतों ने जीवन-स्तर को अत्यधिक ऊँचा उठाया है।
अभिशाप के रूप में विज्ञान:
परमाणु अस्त्रों का विनाशकारी प्रयोग, पर्यावरण-प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों का अन्धाधुन्ध दोहन, तथा सोशल मीडिया की लत जैसी समस्याएँ भी विज्ञान की ही देन हैं। यदि विज्ञान का प्रयोग विवेकहीन ढंग से किया जाए, तो यह मानवता के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
उपसंहार:
वस्तुतः विज्ञान स्वयं न तो वरदान है न अभिशाप — यह मनुष्य के उपयोग की दिशा पर निर्भर करता है। यदि विज्ञान का प्रयोग मानव-कल्याण और सन्तुलित विकास के लिए विवेकपूर्ण ढंग से किया जाए, तो यह निश्चय ही वरदान सिद्ध होगा।