चरण 1: रूपरेखा:
1. प्रस्तावना
2. प्राचीन काल में नारी
3. मध्यकाल में पतन
4. आधुनिक नारी
5. आज की समस्याएँ
6. सुधार के उपाय
7. उपसंहार
चरण 2: निबन्ध:
प्रस्तावना
नारी समाज की आधारशिला है। वह माता, बहन, पत्नी और पुत्री के रूप में परिवार को जोड़ती है। जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में लिखा है: ‘नारी! तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास-रजत-नग पगतल में।’ समाज का स्वरूप बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि उसमें नारी को कैसा स्थान मिला है।
प्राचीन काल में नारी
वैदिक युग में नारी को उच्च सम्मान प्राप्त था। गार्गी, मैत्रेयी, लोपामुद्रा और अपाला जैसी विदुषियों ने शास्त्रार्थ और ऋचाओं की रचना में भाग लिया। शिक्षा और विवाह में उसे अपनी बात कहने का अधिकार था। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ की भावना उसी समय की देन है।
मध्यकाल में पतन
मध्यकाल में विदेशी आक्रमणों और सामाजिक रूढ़ियों के कारण नारी की दशा बिगड़ती गई। पर्दा प्रथा, बाल-विवाह, सती प्रथा और दहेज जैसी कुरीतियों ने उसे घर की चारदीवारी में बन्द कर दिया। शिक्षा से दूर रहने के कारण वह पुरुष पर निर्भर हो गई। मैथिलीशरण गुप्त की पंक्ति ‘अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी’ उस समय की पीड़ा बताती है।
आधुनिक नारी
राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर और महात्मा गांधी जैसे समाज-सुधारकों ने नारी-उत्थान के लिए संघर्ष किया। स्वतंत्रता के बाद संविधान ने स्त्री और पुरुष को समान अधिकार दिए। आज नारी शिक्षा, विज्ञान, राजनीति, सेना, खेल और प्रशासन में आगे है। इन्दिरा गांधी, कल्पना चावला, पी. वी. सिन्धु और मैरी कॉम जैसी महिलाओं ने देश का नाम ऊँचा किया।
आज की समस्याएँ
इतनी प्रगति के बाद भी नारी अनेक समस्याओं से घिरी है। दहेज-हत्या, कन्या-भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा और छेड़छाड़ की घटनाएँ आज भी होती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बालिकाओं की शिक्षा अधूरी रह जाती है। कामकाजी महिला को घर और दफ्तर की दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है, फिर भी उसे बराबर सम्मान और अवसर नहीं मिलते।
सुधार के उपाय
नारी की स्थिति सुधारने के लिए बालिका-शिक्षा पर विशेष बल देना होगा। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी योजनाओं को सच्चे मन से लागू करना चाहिए। कठोर कानूनों के साथ समाज की सोच भी बदलनी होगी। परिवार में बेटा और बेटी के बीच भेदभाव समाप्त करना सबसे पहला कदम है।
उपसंहार
नारी और पुरुष समाज रूपी रथ के दो पहिए हैं। एक पहिया कमजोर हो तो रथ आगे नहीं बढ़ सकता। जब नारी शिक्षित, स्वतंत्र और आत्मनिर्भर होगी, तभी समाज और राष्ट्र सही अर्थ में उन्नति करेगा।
निष्कर्ष:
निबन्ध में प्रस्तावना के बाद क्रम से प्राचीन, मध्य और आधुनिक काल की स्थिति, फिर समस्याएँ और समाधान रखने से विषय का पूरा सामाजिक स्वरूप सामने आ जाता है।