परिभाषा:
सोरठा मात्रिक छंद है, जो दोहे का उल्टा (विपरीत क्रम) रूप है — इसमें भी चार चरण होते हैं, परन्तु प्रथम व तृतीय चरण में 11-11 मात्राएँ तथा द्वितीय व चतुर्थ चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं (दोहे में यह क्रम उलटा होता है)।
उदाहरण: तुलसीदासकृत 'रामचरितमानस' में सोरठा छंद के अनेक उदाहरण प्राप्त होते हैं, जो कथा-प्रसंगों को गति प्रदान करते हैं।