Step 1: भूमिका:
कबीरदास मध्यकालीन भक्ति-आन्दोलन के निर्गुण संत कवि थे, जिनकी वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके समय में थी। उन्होंने जाति-पाति, ऊँच-नीच, धार्मिक आडम्बर और पाखण्ड का घोर विरोध किया — 'जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिये ज्ञान' जैसी पंक्तियाँ आज भी सामाजिक समरसता का सन्देश देती हैं। वर्तमान युग में जब साम्प्रदायिकता, अंधविश्वास और सामाजिक भेदभाव व्याप्त हैं, कबीर की उलटबांसियाँ और दोहे हमें सहिष्णुता, आत्म-चिन्तन तथा सच्ची भक्ति की राह दिखाते हैं। उनका सन्देश 'मन ही में मीत बसे रघुराई' आन्तरिक शुद्धता पर बल देता है, न कि बाह्याडम्बर पर। आज के भौतिकवादी युग में भी कबीर की सहज साधना, समानता और मानवता का सन्देश उतना ही मूल्यवान है। इसी कारण कबीरदास केवल इतिहास के कवि नहीं, अपितु हर युग के प्रासंगिक विचारक हैं।
Final Answer:
उपर्युक्त निबन्ध विषय 'कबीरदास की प्रासंगिकता' पर एक सुसंगठित प्रस्तुति है, जिसमें भूमिका, विषय-वस्तु और निष्कर्ष का समावेश है।