पुर में निकसी रघुबीर-बधू, धीर धीर दये मग में डग दूवे। झलकीं भरी भाल कनी जल की, पुट सुथि गये मधुराधर बै।। फिर बूझति हैं- 'चलनो अब केतनि, पर्णकुटी करिहौं किंत है?' तिय की लखि आतुरता पिय की, आँकिया अति चाक चलीं जल छौ।।
Question: 1
उपयुक्त पद्यांश का संदर्भ लिखिए।
Show Hint
संदर्भ लिखते समय हमेशा यह बताएँ कि पद्यांश किस ग्रंथ या प्रसंग से लिया गया है।
यह पद्यांश रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड से लिया गया है। इसमें वर्णन है कि श्रीराम, सीता और लक्ष्मण गंगा पार करके आगे वन की ओर बढ़ रहे हैं। गंगा तट पर पहुँचते ही श्रीराम भावुक हो जाते हैं और सीता से कहते हैं कि अब उन्हें पर्णकुटी बनानी चाहिए। यह प्रसंग उनके वनवास के प्रारंभिक दिनों का हृदयस्पर्शी चित्रण है।
Was this answer helpful?
0
0
Question: 2
श्रीराम के नैनों से आँसू क्यों बहने लगे?
Show Hint
'क्यों' वाले प्रश्नों में कारण को सीधे और स्पष्ट लिखना चाहिए।
श्रीराम के नैनों से आँसू इसलिए बहने लगे क्योंकि वे वनवास की कठोर परिस्थितियों के बारे में सोचकर भावुक हो गए थे। उन्हें यह विचार आया कि अयोध्या के राजमहलों को छोड़कर अब उन्हें साधारण पर्णकुटी में निवास करना होगा। यह सोचकर उनकी आँखों में करुणा और विषाद के आँसू उमड़ आए।
Was this answer helpful?
0
0
Question: 3
रेखांकित अंश – 'पर्णकुटी कोरिहौं किंतु है' में कौन-सा अलंकार है?
Show Hint
अलंकार पहचानते समय यह देखना जरूरी है कि उसमें किस प्रकार की विशेषता (व्यंग्य, अनुप्रास, उपमा आदि) छिपी हुई है।
रेखांकित अंश 'पर्णकुटी कोरिहौं किंतु है' में व्याजस्तुति अलंकार है। यहाँ पर्णकुटी बनाने की बात कहकर महलों और सुख-सुविधाओं के त्याग की व्यंजना की गई है। इस प्रकार त्याग और सरल जीवन की महिमा अप्रत्यक्ष रूप से प्रकट होती है।