प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी का जन्म 1930 में हुआ था। वे हिंदी साहित्य के एक प्रमुख आलोचक, निबंधकार, और शिक्षक थे। वे साहित्य की आलोचना को नए दृष्टिकोण से समझने में माहिर थे और समकालीन साहित्यिक चिंताओं के प्रति उनका दृष्टिकोण अत्यधिक प्रखर था। प्रो. रेड्डी ने भारतीय समाज, राजनीति, और संस्कृति के विभिन्न पहलुओं पर गहरे विचार किए और इन्हें अपने लेखन का हिस्सा बनाया। उनका आलोचनात्मक कार्य साहित्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संदर्भों से जुड़ा हुआ था। उन्होंने विशेष रूप से नारीवाद, दलित साहित्य और शोषित वर्गों के साहित्य पर विस्तार से लिखा। प्रो. जी. सुन्दर रेड्डी का लेखन सामाजिक सशक्तिकरण और समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। उनकी आलोचनाएँ सिर्फ साहित्य के कला रूप तक सीमित नहीं थीं, बल्कि उन्होंने साहित्य को समाज में बदलाव लाने के एक उपकरण के रूप में प्रस्तुत किया। उनके कार्यों ने न केवल साहित्य को, बल्कि समाज और संस्कृति को भी नए दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित किया। उनका योगदान आलोचना के क्षेत्र में अमूल्य था और उन्होंने साहित्य को समाज की आवाज़ बनाने का काम किया।