निम्नलिखित पद्यांश पर आधारित प्रश्नों के उत्तर लिखिए: कृपानिधान सुजान संभु हिय की गति जानी । दियौ सीस पर ठाम बाम करि कै मनमानी । सकुचति ऐचति अंग गंग सुख संग लजानी । जटाजूट हिम कूट सघन बन सिमिरि समानी ।
Question: 1
उपर्युक्त पद्यांश के पाठ का शीर्षक व कवि का नाम लिखिए।
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किसी भी पद्यांश को समझने के लिए उसके संदर्भ और केंद्रीय भाव को ध्यानपूर्वक पढ़ना आवश्यक होता है।
उपर्युक्त पद्यांश 'गंगावतरण' नामक काव्यांश से लिया गया है, जिसके रचनाकार तुलसीदास हैं। इस काव्यांश में भगवान शिव और गंगा के संबंध का सुंदर वर्णन किया गया है।
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Question: 2
रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
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काव्य में उपमाओं और अलंकारों का सही अध्ययन करने से पद्यांश की गहराई को समझने में सहायता मिलती है।
रेखांकित अंश में यह बताया गया है कि जब गंगा भगवान शिव के जटाजूट में समाहित हुईं, तो वे संकोच और लज्जा का अनुभव करने लगीं। वे शिव के शरीर से लिपटकर इस प्रकार समाहित हो गईं, मानो हिमालय के घने वन में विलीन हो रही हों। इस पंक्ति में गंगा के कोमल स्वभाव और शिव के विराट रूप का सौंदर्यपूर्ण वर्णन किया गया है।
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Question: 3
प्रस्तुत पंक्तियों में गंगा और शिवजी का किस रूप में वर्णन किया गया है?
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भारतीय काव्यशास्त्र में प्रकृति के मानवीकरण (Personification) की परंपरा रही है, जहाँ गंगा जैसी नदियों को स्त्री रूप में चित्रित किया जाता है।
प्रस्तुत पंक्तियों में गंगा को एक लज्जालु और संकोची नायिका के रूप में चित्रित किया गया है, जो भगवान शिव के संपर्क में आने पर लज्जित अनुभव कर रही हैं। वहीं, शिवजी को कृपानिधान (दया से परिपूर्ण) और सुजान (समझदार) बताया गया है, जिन्होंने गंगा की गति को समझकर उन्हें अपनी जटाओं में स्थान दिया।
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Question: 4
प्रस्तुत पद्यांश में कौन-सा रस प्रयुक्त हुआ है?
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श्रृंगार रस का स्थायी भाव 'रति' होता है, और यह केवल नायक-नायिका के प्रेम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि प्रकृति और ईश्वर के प्रति भक्ति में भी व्यक्त होता है।
प्रस्तुत पद्यांश में मुख्य रूप से श्रृंगार रस का प्रयोग हुआ है, क्योंकि इसमें गंगा की संकोच, लज्जा और उनके शिवजी के साथ संबंध का वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त, शिवजी के कृपा और भक्ति भाव के कारण इसमें भक्तिरस का भी आभास होता है।
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Question: 5
प्रस्तुत पद्यांश में शिवजी ने गंगा को अपने शरीर पर किस रूप में स्थान दिया?
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गंगावतरण की यह कथा हिंदू धर्म में महत्वपूर्ण मानी जाती है और इसे शिवजी की कृपा और धैर्य का प्रतीक माना जाता है।
प्रस्तुत पद्यांश में शिवजी ने गंगा को अपनी जटाओं में स्थान दिया है। जब गंगा पृथ्वी पर उतरने लगीं, तो उनकी वेगवती धारा के कारण पृथ्वी को क्षति होने की संभावना थी। इसे रोकने के लिए भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया और फिर धीरे-धीरे उन्हें पृथ्वी पर प्रवाहित किया।