निम्नलिखित गद्यांश पढ़कर सूचना के अनुसार कृतियाँ पूर्ण कीजिए:
संग्राम से तेज़ी उन्हें कोई से तीन सौ रुपए मिल गए। वहीं बैठी मेरी पत्नी मेरे पास जमा करके उन्होंने मुझे अपने चर्च का बजट बना देने का आदेश दिया। जिन्हें मेरा व्यक्तिगत हिसाब रखना पड़ता है, वे जानते हैं कि यह काम मेरे लिए कितना कठिन होता है। न वे चार्ट लंबी कर पाते हैं, न मुझे निकालने पर बाँधकर सकते हैं; और इस प्रकार एक विविध रसालियों में तीन दिन बीतते रहते हैं। पर यदि अनुसूचित परीक्षार्थियों की प्रतियोगिता हो तो सौ में से दस अंक पाने वाला भी अपने-आपको शून्य पाने वाले से श्रेष्ठ मानेगा।
अस्तु, नमक से लेकर गीली लकड़ी तक और चप्पल से लेकर मकान के किराए तक का जो अनुभव मुझे बना; वह जब निराला जी को पसंद आ गया, तब पहली बार मुझे अंग्रेज़ीशास्त्र के ज्ञान पर गर्व हुआ। पर दूसरे ही दिन से मेरे गर्व की व्यक्ति सिद्धि खोने लगी। वे कहते हैं—प्यास बुझाओ चाहिए… किसी दिव्यात्मा की परीक्षा शुल्क जमा करता है, अन्यथा वह परीक्षा में नहीं बैठ सकेगा। स्पष्ट होता है—किसी साहित्यिक मित्र को साल में दो बार देने की आवश्यकता पड़ गई। दूसरे किसी लखनऊ के किसी तोलमोल की गाड़ी चालान का मनीऑर्डर करना पड़ता। चौथाई का किसी दिव्यात्मा मित्र की भतीजी के विवाह के लिए देने का अभिनिवेश हो गया। संक्षेप यह कि तीसरे दिन उनका जो किया हुआ रुपया समाप्त हो गया। अब तक उनके व्यवसायक के नोट यह दान खाता मेरे हिस्से आ पड़ा।
संजाल पूर्ण कीजिए:
निराला जी का जमा किया हुआ रुपया समाप्त हो गया
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रुपया इस प्रकार समाप्त हो गया
\(\hspace{1cm}\)↓
दान खाते में मेरा हिस्सा आ गया
Step 1: गद्यांश का सार.
गद्यांश में लेखक ने अपने अनुभवों का उल्लेख किया है जिसमें निराला जी द्वारा दिया गया पैसा धीरे-धीरे अलग-अलग कारणों से समाप्त हो गया। यह एक हास्य और व्यंग्य का मिश्रण है जो जीवन की छोटी-छोटी आर्थिक परेशानियों को दर्शाता है।
Step 2: संजाल का विश्लेषण.
पहले निराला जी ने पैसे जमा किए, फिर वह धीरे-धीरे जरूरतों और दान कार्यों में समाप्त हो गया। अंततः वे पैसे लेखक के हिस्से में दान खाते के रूप में जुड़ गए।
Step 3: निष्कर्ष.
संपूर्ण गद्यांश इस बात को स्पष्ट करता है कि 'निराला जी का जमा किया हुआ रुपया समाप्त हो गया और वह दान खाते में मेरे हिस्से में आ गया'।
निम्नलिखित शब्दों के लिए गद्यांश में आए हुए विलोम शब्द लिखिए:
\[\begin{array}{|c|c|} \hline \textbf{शब्द} & \textbf{विलोम शब्द (गद्यांश से)} \\ \hline \text{(1) वियोग} & \text{संयोग} \\ \hline \text{(2) उत्तीर्ण} & \text{अनुत्तीर्ण} \\ \hline \text{(3) नापसंद} & \text{पसंद} \\ \hline \text{(4) अज्ञान} & \text{ज्ञान} \\ \hline \end{array}\]
Step 1: गद्यांश का पुनर्पाठ.
गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़ने पर हमें चार शब्दों के विलोम शब्द स्पष्ट रूप से मिलते हैं — ये सभी शब्द लेखक के जीवन अनुभवों और भावनाओं को दर्शाने वाले हैं।
Step 2: विलोम शब्दों की पहचान.
गद्यांश में "संग्राम से संयोग" जैसे वाक्यांशों से 'वियोग' का विलोम 'संयोग' प्राप्त होता है। इसी प्रकार, 'उत्तीर्ण' का विलोम 'अनुत्तीर्ण', 'नापसंद' का विलोम 'पसंद', और 'अज्ञान' का विलोम 'ज्ञान' है।
Step 3: निष्कर्ष.
इस प्रकार गद्यांश में दिए गए सभी शब्दों के सही विलोम शब्द क्रमशः संयोग, अनुत्तीर्ण, पसंद और ज्ञान हैं।
जीवन में मित्रों का महत्व' इस विषय पर अपने विचार 40 से 50 शब्दों में लिखिए।
Step 1: विषय की व्याख्या.
प्रश्न का विषय 'जीवन में मित्रों का महत्व' है। यह बताता है कि मित्रता केवल संबंध नहीं, बल्कि भावनात्मक सहारा और नैतिक समर्थन का आधार है।
Step 2: विचार विस्तार.
मित्र कठिन समय में हौसला देते हैं और सही राह दिखाते हैं। उनके साथ जीवन के सुख-दुख बाँटने से व्यक्ति का मनोबल बढ़ता है। सच्ची मित्रता जीवन को खुशहाल बनाती है।
Step 3: निष्कर्ष.
मित्रों के बिना जीवन अधूरा है; इसलिए सच्चे मित्रों का होना जीवन के लिए सबसे बड़ा वरदान है।
निम्नलिखित पठित काव्यांश पर आधारित बहुविकल्पी प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनकर लिखिए :
नाथ संभुधनु भंजनिहारा, होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
आयेसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरिकरनी करि करिअ लराई॥
सुनहु राम जेहि सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥
सुनि मुनिबचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अवमाने॥
बहु धनुही तोरी लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
येहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥
निम्नलिखित पठित गद्यांश पर आधारित बहुविकल्पी प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनकर लिखिए :
गाड़ी छूट रही थी। सेकंड क्लास के एक छोटे डिब्बे को खाली समझकर, जरा दौड़कर उसमें चढ़ गए। अनुमान के प्रतिकूल डिब्बा निर्जन नहीं था। एक बर्थ पर लखनऊ की नवाबी नस्ल के एक सफ़ेदपोश सज्जन बहुत सुविधा से पालथी मारे बैठे थे। सामने दो ताजे-चिकने खीरे तौलिए पर रखे थे। डिब्बे में हमारे सहसा कूद जाने से सज्जन की आँखों में एकांत चिंतन में विघ्न का असंतोष दिखाई दिया। सोचा, हो सकता है, यह भी कहानी के लिए सूझ की चिंता में हों या खीरे-जैसी अपदार्थ वस्तु का शौक करते देखे जाने के संकोच में हों।
नवाब साहब ने संगति के लिए उत्साह नहीं दिखाया। हमने भी उनके सामने की बर्थ पर बैठकर आत्मसम्मान में आँखें चुरा लीं।
ठाली बैठे, कल्पना करते रहने की पुरानी आदत है। नवाब साहब की असुविधा और संकोच के कारण का अनुमान करने लगे। संभव है, नवाब साहब ने बिलकुल अकेले यात्रा कर सकने के अनुमान में किफ़ायत के विचार से सेकंड क्लास का टिकट खरीद लिया हो और अब गवारा न हो कि शहर का कोई सफ़ेदपोश उन्हें मँझले दर्जे में सफ़र करता देखे।
परंपरागत भोजन को लोकप्रिय कैसे बनाया जा सकता है ?
i. उपलब्ध करवाकर
ii. प्रचार-प्रसार द्वारा
iii. बिक्री की विशेष व्यवस्था करके
iv. घर-घर मुफ्त अभियान चलाकर विकल्प:
बार-बार आती है मुखाकृति मधुर, याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मधुर खुशी मेरी।
चिंता रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्बंध स्वच्छंद।
कैसे भुला जा सकता है बचपन का अद्भुत आनंद।
ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था, छुआ-छूत किसे कहते?
बनी हुई थी वहीं झोपड़ी और सीपियों से नावें।
रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।
बड़े-बड़े मोती सी आँसू, चुपचाप बहा जाते थे।
वह सुख जो साधारण जीवन छोड़कर महत्वाकांक्षाएँ बड़ी हुईं।
टूट गईं कुछ खो गईं हुई-सी दौड़-धूप घर खड़ी हुईं।
नाटक की तरह एकांकी में चरित्र अधिक नहीं होते। यहाँ प्रायः एक या अधिक चरित्र नहीं होते। चरित्रों में भी केवल नायक की प्रधानता रहती है, अन्य चरित्र उसके व्यक्तित्व का प्रसार करते हैं। यही एकांकी की विशेषता है कि नायक सर्वत्र प्रमुखता पाता है। एकांकी में घटनाएँ भी कम होती हैं, क्योंकि सीमित समय में घटनाओं को स्थान देना पड़ता है। हास्य, व्यंग्य और बिंब का काम अक्सर चरित्रों और नायक के माध्यम से होता है। एकांकी का नायक प्रभावशाली होना चाहिए, ताकि पाठक या दर्शक पर गहरा छाप छोड़ सके।
इसके अलावा, घटनाओं के उद्भव-पतन और संघर्ष की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि नायक ही संपूर्णता में कथा का वाहक होता है। यही कारण है कि नाटकों की तरह इसमें अनेक पात्रों का कोई बड़ा-छोटा संघर्ष नहीं होता। नायक के लिए सर्वगुणसंपन्न होना भी आवश्यक नहीं होता। वह साधारण जीवन जीता हुआ व्यक्ति भी हो सकता है।
इस गद्यांश से यह स्पष्ट होता है कि एकांकी में चरित्रों की संख्या सीमित होती है, नायक अधिक प्रभावशाली होता है और बाहरी संघर्ष बहुत कम दिखाया जाता है।