Comprehension

मातृभूमि पर निवास करने वाले मनुष्य राष्ट्र का दूसरा अंग हैं। पृथ्वी हो और मनुष्य न हो, तो राष्ट्र की कल्पना असंभव है। पृथ्वी और जन दोनों के समन्वय से ही राष्ट्र का स्वरूप सजीव होता है। इन के कारण ही पृथ्वी मातृभूमि की संज्ञा प्राप्त करती है। पृथ्वी माता है और उस उच्च अर्थ में पृथ्वी का पुत्र है— (पिता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः।)—भूमि माता है, मैं उसका पुत्र हूँ।—जन के हृदय में इस सत्य का अनुभव ही राष्ट्रभावना की कुंजी है। इसी भावना से राष्ट्रभावना के अंकुर उत्पन्न होते हैं।

Question: 1

रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

Updated On: Nov 10, 2025
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रेखांकित अंश का तात्पर्य यह है कि पृथ्वी, राष्ट्र और जनता के समन्वय से ही राष्ट्र का स्वरूप सजीव होता है।
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Question: 2

रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

Updated On: Nov 10, 2025
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रेखांकित अंश का तात्पर्य यह है कि पृथ्वी, राष्ट्र और जनता के समन्वय से ही राष्ट्र का स्वरूप सजीव होता है।
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Question: 3

राष्ट्र का दूसरा अंग क्या है?

Updated On: Nov 10, 2025
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राष्ट्र का दूसरा अंग जनता है, जो मातृभूमि पर निवास करती है।
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Question: 4

राष्ट्र की कल्पना का कुंज क्या है?

Updated On: Nov 10, 2025
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राष्ट्र की कल्पना का कुंज मातृभूमि की भावना है।
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Question: 5

राष्ट्रभावना की कुंजी क्या है?

Updated On: Nov 10, 2025
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राष्ट्रभावना की कुंजी नागरिकों के हृदय में समर्पण और एकता की भावना है।
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