मातृभूमि पर निवास करने वाले मनुष्य राष्ट्र का दूसरा अंग हैं। पृथ्वी हो और मनुष्य न हो, तो राष्ट्र की कल्पना असंभव है। पृथ्वी और जन दोनों के समन्वय से ही राष्ट्र का स्वरूप सजीव होता है। इन के कारण ही पृथ्वी मातृभूमि की संज्ञा प्राप्त करती है। पृथ्वी माता है और उस उच्च अर्थ में पृथ्वी का पुत्र है— (पिता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः।)—भूमि माता है, मैं उसका पुत्र हूँ।—जन के हृदय में इस सत्य का अनुभव ही राष्ट्रभावना की कुंजी है। इसी भावना से राष्ट्रभावना के अंकुर उत्पन्न होते हैं।
रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
राष्ट्र का दूसरा अंग क्या है?
राष्ट्र की कल्पना का कुंज क्या है?
राष्ट्रभावना की कुंजी क्या है?