अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' का जन्म 15 अप्रैल 1865 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में हुआ था। वे द्विवेदी युग के प्रमुख कवि थे। उनकी रचनाओं में सामाजिक जागरूकता, आदर्शवाद और नैतिकता का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। वे हिंदी काव्य को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने वाले कवियों में से एक थे।
उनकी साहित्यिक विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
द्विवेदी युग के प्रमुख कवि – उनकी कविताएँ आदर्शवाद, नैतिकता और राष्ट्रप्रेम पर आधारित हैं।
भाषा-शैली – संस्कृतनिष्ठ, ओजस्वी और प्रभावशाली भाषा का प्रयोग।
छंदबद्धता – वे हिंदी में महाकाव्य रचनाएँ करने वाले प्रमुख कवियों में से एक थे।
नैतिकता और समाज सुधार – उनके काव्य में समाज सुधार और नैतिकता का विशेष महत्त्व था।
प्रेरणादायक काव्य – उनकी कविताएँ पाठकों को उच्च आदर्शों और नैतिक मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देती हैं।
प्रभावशाली उपमाएँ और अलंकार – उनकी कविताओं में उत्कृष्ट उपमाओं और अलंकारों का प्रयोग हुआ है।
लोकप्रिय रचनाएँ – 'प्रिय प्रवास', 'वैदेही वनवास', 'रुक्मिणी परिणय', 'काव्य कल्पना', 'रस रसायन' आदि।
सम्मान और पुरस्कार – उन्हें 1937 में 'प्रिय प्रवास' के लिए मंगलाप्रसाद पारितोषिक पुरस्कार प्राप्त हुआ। यह हिंदी में लिखा गया पहला महाकाव्य माना जाता है।
अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' ने हिंदी काव्य को नई दिशा प्रदान की और आदर्शवाद तथा नैतिकता को प्रमुखता दी। उनकी रचनाएँ हिंदी साहित्य में विशेष स्थान रखती हैं। 16 मार्च 1947 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनका योगदान हिंदी साहित्य में अमर रहेगा।