इच्छाएँ नाना हैं और नाना विधि हैं और वे उसे प्रवृत्त रखती हैं| प्रवृत्ति से वह रह-रहकर थक जाता है और निवृत्ति चाहता है । यह प्रवृत्ति और निवृत्ति का चक्र उसको द्वन्द्व से थका मारता है । इस संसार को अभी राग-भाव से वह चाहता है कि अगले क्षण उतने ही भाव-विराग से वह उसका बिनाश चाहता है । पर राग-द्वेष की वासनाओं से अंत में झुंझलाहट और छटपटाहट ही उसे आती है।