चरण 1 (पाठ व लेखक):
यह ललित निबन्ध-शैली का अंश अशोक-वृक्ष की सांस्कृतिक-ऐतिहासिक महत्ता पर केन्द्रित एक प्रकृति-चित्रणपरक निबन्ध से लिया गया है, जिसमें लेखक प्राचीन भारतीय उत्सव-परम्परा का स्मरण करता है।
चरण 2 (पूजा किसकी देन):
अशोक-वृक्ष की पूजा गन्धर्वों और यक्षों की देन बतायी गयी है।
चरण 3 (व्याख्या):
'मैं जब अशोक के लाल स्तवकों को देखता हूँ, तो मुझे वह पुराना वातावरण प्रत्यक्ष दिखायी दे जाता है' — इस पंक्ति में लेखक अशोक-वृक्ष के लाल पुष्प-गुच्छों को देखकर प्राचीन काल के मदनोत्सव के सजीव, उल्लासपूर्ण वातावरण की कल्पना में खो जाता है; यह वर्तमान दृश्य के माध्यम से अतीत के सांस्कृतिक वैभव के स्मरण को दर्शाता है।
चरण 4 (मदनोत्सव):
अशोक-वृक्ष की असल पूजा वृक्ष की नहीं, बल्कि उसके अधिष्ठाता देवता कन्दर्प (कामदेव) की होती थी, और इसी उत्सव को 'मदनोत्सव' कहा जाता था।
चरण 5 (सरस्वती-कण्ठाभरण):
'सरस्वती-कण्ठाभरण' महाराज भोज की रचना है, जिससे यह ज्ञात होता है कि मदनोत्सव त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता था।