गद्यांशः
किञ्चित्कालानन्तरं शृगालः मृगम् अवदत्, 'वनेऽस्मिन् एकं सस्यपूर्णक्षेत्रमस्ति। दर्शयामि त्वाम्।' तथा कृते मृगः प्रत्यहं तत्र गत्वा सस्यम् अखादत्। तद् दृष्ट्वा एकस्मिन् दिने क्षेत्रपतिना पाशः योजितः। तत्रागतः मृगः पाशैर्बद्धः। सः अचिन्तयत्, "इदानीं मित्राण्येव शरणं मम।" दूरात् तत् पश्यन् जम्बूकः मनसि आनन्दितः। सोऽचिन्तयत्, "फलितः मे मनोरथः। इदानीं प्रभूतं भोजनं प्राप्स्यामि।" मृगस्तं दृष्ट्वा अब्रवीत्, "मित्र, छिन्धि तावन्मम बन्धनम्। त्रायस्व माम्।" जम्बूको दूरादेवावदत्, "मित्र, दृढोऽयं बन्धः। स्नायुनिर्मितान् पाशानेतान् कथं वा व्रतदिवसे स्पृशामि ?" इत्युक्त्वा सः समीपमेव वृक्षस्य पृष्ठतः निभृतं स्थितः।
प्रदोषकाले मृगमन्विष्यन् काकस्तत्रोपस्थितः। मृगं तथाविधं दृष्ट्वा स उवाच, "सखे! किमेतत्?" मृगेणोक्तम्, "सुहृद्वाक्यस्य अनादरात् बद्धोऽहम्। उक्तं च -
सुहृदां हितकामानां यः शृणोति न भाषितम्।
विपत् सन्निहिता तस्य सः नरः शत्रुनन्दनः॥"
काकः अब्रूत, "स वञ्चकः क्वास्ते?" मृगेणोक्तम्, "मन्मांसार्थी तिष्ठत्यत्रैष।" काकः उक्तवान्, "उपायस्तावत् चिन्तनीयः।"
उचितं पर्यायं चित्वा वाक्यं पुनर्लिखत।
(1) एकस्मिन् दिने \(\underline{\hspace{2cm}}\) पाशः योजितः। (क्षेत्रपतिना/जम्बूकेन)
(2) फलितः मे \(\underline{\hspace{2cm}}\)। (कार्यभागः/मनोरथः)
पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत। क्षुद्रबुद्धिः कुत्र निभृतं स्थितः?
वाक्यं पुनर्लिखित्वा सत्यम्/असत्यम् इति लिखत। क्षेत्रम् आगतः शृगालः पाशैर्बद्धः।
एषः गद्यांशः कस्मात् पाठात् उद्धृतः?
लकारं लिखत। इदानीं प्रभूतं भोजनं \(\underline{प्राप्स्यामि}\) ।
सन्धिविग्रहं कुरुत। वनेऽस्मिन् = \(\underline{\hspace{2cm}}\) + \(\underline{\hspace{2cm}}\)
प्रश्न-निर्माणं कुरुत। \(\underline{प्रदोषकाले}\) मृगमन्विष्यन् काकः तत्रोपस्थितः।
पृथक्करणम्। क्रमेण योजयत।
(1) क्षेत्रपतिना पाशयोजनम्।
(2) शृगालेन मृगाय सस्यपूर्णक्षेत्रस्य दर्शनम्।
(3) मृगस्य पाशबन्धनम्।
(4) मृगस्य प्रत्यहं क्षेत्रं गमनम्।
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नाथ संभुधनु भंजनिहारा, होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
आयेसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरिकरनी करि करिअ लराई॥
सुनहु राम जेहि सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥
सुनि मुनिबचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अवमाने॥
बहु धनुही तोरी लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
येहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥
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गाड़ी छूट रही थी। सेकंड क्लास के एक छोटे डिब्बे को खाली समझकर, जरा दौड़कर उसमें चढ़ गए। अनुमान के प्रतिकूल डिब्बा निर्जन नहीं था। एक बर्थ पर लखनऊ की नवाबी नस्ल के एक सफ़ेदपोश सज्जन बहुत सुविधा से पालथी मारे बैठे थे। सामने दो ताजे-चिकने खीरे तौलिए पर रखे थे। डिब्बे में हमारे सहसा कूद जाने से सज्जन की आँखों में एकांत चिंतन में विघ्न का असंतोष दिखाई दिया। सोचा, हो सकता है, यह भी कहानी के लिए सूझ की चिंता में हों या खीरे-जैसी अपदार्थ वस्तु का शौक करते देखे जाने के संकोच में हों।
नवाब साहब ने संगति के लिए उत्साह नहीं दिखाया। हमने भी उनके सामने की बर्थ पर बैठकर आत्मसम्मान में आँखें चुरा लीं।
ठाली बैठे, कल्पना करते रहने की पुरानी आदत है। नवाब साहब की असुविधा और संकोच के कारण का अनुमान करने लगे। संभव है, नवाब साहब ने बिलकुल अकेले यात्रा कर सकने के अनुमान में किफ़ायत के विचार से सेकंड क्लास का टिकट खरीद लिया हो और अब गवारा न हो कि शहर का कोई सफ़ेदपोश उन्हें मँझले दर्जे में सफ़र करता देखे।
परंपरागत भोजन को लोकप्रिय कैसे बनाया जा सकता है ?
i. उपलब्ध करवाकर
ii. प्रचार-प्रसार द्वारा
iii. बिक्री की विशेष व्यवस्था करके
iv. घर-घर मुफ्त अभियान चलाकर विकल्प:
बार-बार आती है मुखाकृति मधुर, याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मधुर खुशी मेरी।
चिंता रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्बंध स्वच्छंद।
कैसे भुला जा सकता है बचपन का अद्भुत आनंद।
ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था, छुआ-छूत किसे कहते?
बनी हुई थी वहीं झोपड़ी और सीपियों से नावें।
रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।
बड़े-बड़े मोती सी आँसू, चुपचाप बहा जाते थे।
वह सुख जो साधारण जीवन छोड़कर महत्वाकांक्षाएँ बड़ी हुईं।
टूट गईं कुछ खो गईं हुई-सी दौड़-धूप घर खड़ी हुईं।
नाटक की तरह एकांकी में चरित्र अधिक नहीं होते। यहाँ प्रायः एक या अधिक चरित्र नहीं होते। चरित्रों में भी केवल नायक की प्रधानता रहती है, अन्य चरित्र उसके व्यक्तित्व का प्रसार करते हैं। यही एकांकी की विशेषता है कि नायक सर्वत्र प्रमुखता पाता है। एकांकी में घटनाएँ भी कम होती हैं, क्योंकि सीमित समय में घटनाओं को स्थान देना पड़ता है। हास्य, व्यंग्य और बिंब का काम अक्सर चरित्रों और नायक के माध्यम से होता है। एकांकी का नायक प्रभावशाली होना चाहिए, ताकि पाठक या दर्शक पर गहरा छाप छोड़ सके।
इसके अलावा, घटनाओं के उद्भव-पतन और संघर्ष की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि नायक ही संपूर्णता में कथा का वाहक होता है। यही कारण है कि नाटकों की तरह इसमें अनेक पात्रों का कोई बड़ा-छोटा संघर्ष नहीं होता। नायक के लिए सर्वगुणसंपन्न होना भी आवश्यक नहीं होता। वह साधारण जीवन जीता हुआ व्यक्ति भी हो सकता है।
इस गद्यांश से यह स्पष्ट होता है कि एकांकी में चरित्रों की संख्या सीमित होती है, नायक अधिक प्रभावशाली होता है और बाहरी संघर्ष बहुत कम दिखाया जाता है।
Study the entries in the following table and rewrite them by putting the connected items in the single row: 