भाषा और संस्कृति पर आधारित गद्यांश
भाषा स्वयं संस्कृति का एक अटूट अंग है। संस्कृति परम्परा से निर्मित होने पर भी परिवर्तनशील और गतिशील है। उसकी गति विज्ञान की प्रगति के साथ जोड़ी जाती है। वैज्ञानिक अद्यतनों के प्रभाव के कारण उत्पन्न नई सांस्कृतिक हलचलों को शाब्दिक रूप देने के लिए भाषा के परम्परागत प्रयोग पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए नये प्रयोगों की, नयी भाव-भूमियों को व्यक्त करने के लिए नये शब्दों की खोज की महती आवश्यकता है।
पाठ का शीर्षक एवं लेखक का नाम लिखिए।
उल्लेखित अंश की व्याख्या कीजिए।
नए शब्दों की खोज क्यों आवश्यक है?
संस्कृति का एक अटूट अंग क्या है?
किनके लिए भाषा के परंपरागत प्रयोग पर्याप्त नहीं हैं?