यह अवतरण हमें यह समझाने की कोशिश करता है कि जब व्यक्ति भक्ति या सही मार्ग से विमुख होता है, तो वह धर्म के नाम पर अधर्म करता है।
यह पंक्ति विशेष रूप से धार्मिक कर्मकांडों या सामाजिक व्यवस्था की आलोचना करती है। जब लोग धर्म का पालन नहीं करते और अपने स्वार्थ के लिए धर्म का उपयोग करते हैं, तो यह अधर्म का रूप ले लेता है। उदाहरण स्वरूप, धार्मिक दिखावे के पीछे छिपकर अन्याय करना, या दूसरों के विश्वासों का अनादर करना अधर्म माना जाता है। ऐसे कर्म न केवल समाज में विघटन पैदा करते हैं, बल्कि व्यक्ति की आंतरिक शुद्धि को भी प्रभावित करते हैं।
यह हमें यह सिखाता है कि धर्म केवल बाह्य आचार-विचार और रिवाजों का समूह नहीं है, बल्कि यह आंतरिक भक्ति, सत्यनिष्ठा और नैतिकता का प्रतिबिंब है। जब व्यक्ति केवल दिखावे के लिए धर्म का पालन करता है, बिना उसके सार को समझे और अपनाए, तो उसके कर्म अधर्म की श्रेणी में आते हैं।
अतः धर्म का वास्तविक अर्थ है मन, वचन, और कर्म में संयम और सच्चाई बनाए रखना। धर्म तभी सच्चा और पवित्र होता है जब वह व्यक्ति के आचरण में नैतिकता और प्रेम का संचार करता है। अधर्म से बचने के लिए हमें धर्म के मूल तत्वों को समझना और उसे जीवन में उतारना आवश्यक है।