Step 1: Understanding the Question:
दी गई काव्य पंक्ति में निहित रस की पहचान करनी है।
Step 2: Key Concept:
रस का अर्थ है काव्य से मिलने वाला आनंद। हास्य रस का स्थायी भाव 'हास' होता है। जब किसी व्यक्ति या वस्तु की विचित्र वेशभूषा, वाणी, या क्रियाकलाप को देखकर हृदय में हँसी का भाव उत्पन्न होता है, तो वहाँ हास्य रस होता है।
Step 3: Detailed Explanation:
पंक्ति का अर्थ है: "विंध्याचल पर्वत पर रहने वाले तपस्वी, जो महान तप का व्रत धारण किए हुए हैं, बिना नारी के बहुत दुःखी हैं।"
यहाँ तपस्वियों की स्थिति का वर्णन मजाकिया ढंग से किया गया है। तपस्वी मोह-माया से दूर होते हैं, परन्तु यहाँ उन्हें नारी के बिना दुःखी बताया गया है। उनकी तपस्या और उनकी इच्छा के बीच का यह विरोधाभास हँसी उत्पन्न करता है। 'दुःखारे' शब्द का प्रयोग यहाँ करुणा के लिए नहीं, बल्कि उनकी दयनीय और हास्यास्पद स्थिति को दर्शाने के लिए किया गया है। यह तुलसीदास की 'रामचरितमानस' की पंक्ति है, जहाँ गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के उद्धार की बात सुनकर विंध्याचल के ऋषि प्रसन्न होते हैं कि अब राम यहाँ भी पत्थर की शिलाओं को नारी बना देंगे। इस विचार से ही हँसी आती है।
Step 4: Final Answer:
अतः, इस पंक्ति में हास्य रस है।