'स्वधर्म' के तात्पर्य स्पष्ट करें।
Step 1: परिभाषा.
स्वधर्म = स्वभावानुकूल दायित्व; कर्म का मापदण्ड 'फल' नहीं, 'नैतिक उचितता' और 'समत्व'।
Step 2: निष्कामता.
फलासक्ति छोड़े बिना स्वधर्म बन्धन देता है; ईश्वरार्पण और समत्व इसे योग बनाते हैं।
Step 3: व्यावहारिकता.
अपनी योग्यता/भूमिका का यथार्थ आकलन—विद्यार्थी, गृहस्थ, कर्मचारी, नागरिक—सबके कर्तव्य भिन्न, पर नैतिक।
Step 4: परिणाम.
स्वधर्म से स्थिरता, आत्मविश्वास और आन्तरिक शान्ति बढ़ती है; समाज में भी न्याय और सुव्यवस्था प्रबल होती है।
योग दर्शन में 'चित्तवृत्ति निरोध' को क्या कहते हैं?
भारतीय दर्शन की उत्पत्ति किससे मानी जाती है?
अद्वैत वेदान्त के अनुसार 'जगत' की सत्ता क्या है?
चार्वाक, बौद्ध और जैन किस दार्शनिक सम्प्रदाय में आते हैं?
स्याद्वाद को समझाने के लिए जैन दर्शन में कितने 'नयों/भंगियों' का प्रतिपादन किया गया?