व्याख्या: कवि केदारनाथ सिंह नदी के प्रतीकात्मक स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि यदि तुम जीवन में हड़बड़ी और तेज गति से भागोगे तो नदी (अर्थात् जीवन की सहजता, संस्कृति और संवेदना) तुमसे बहुत पीछे छूट जाएगी। तुम उसे पकड़ नहीं पाओगे। लेकिन यदि तुम उसे अपने साथ लेकर चलोगे, अर्थात् जीवन को सहजता, धैर्य और संवेदना के साथ जिओगे, तो वह तुम्हारे साथ कहीं भी और हर परिस्थिति में चलती चली जाएगी। वह इतनी सहज और अपनी है कि तुम्हारे जीवन के सबसे साधारण और उपेक्षित क्षणों में भी, यहाँ तक कि कबाड़ी की दुकान जैसी निरर्थक जगह पर भी, वह तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेगी। इसका भाव यह है कि जीवन की सच्ची अनुभूति और संस्कृति, भाग-दौड़ में नहीं, बल्कि उसे धैर्य और अपनत्व के साथ जीने में है।