दोनों अनुपात प्रणाली की तरलता और स्थिरता सँभालने के उपकरण हैं, पर स्वरूप और प्रभाव अलग हैं। CRR पूरी तरह RBI के पास नकद रिज़र्व के रूप में रखा जाता है, इसलिए यह सीधे बैंकों की उधारी योग्य निधि घटाता है; इस पर बैंक प्रायः आय नहीं कमाते। SLR बैंक अपने पास रखते हैं और इसे नकद, सोना या मुख्यतः सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश कर सकते हैं; अतः क्रेडिट पर अंकुश तो रहता है, पर इससे कुछ आय अर्जित होती है। CRR मौद्रिक नीति का तेज साधन है, जबकि SLR सावधानी और सॉल्वेंसी सुनिश्चित करने का भी उपाय है। दोनों के परिवर्तन से उधार लागत, बाज़ार ब्याज दरें और कुल मुद्रा आपूर्ति प्रभावित होती हैं। परीक्षा में याद रखें: CRR with RBI, SLR with bank.