मुगलकालीन भू-राजस्व व्यवस्था, जिसे अकबर के काल में व्यवस्थित रूप दिया गया, बहुत सुसंगठित थी। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं:
भूमि की पैमाइश (Measurement of Land): सबसे पहले, कृषि योग्य भूमि की सही-सही पैमाइश की जाती थी। अकबर ने इसके लिए बांस से बनी 'जरीब' का प्रयोग शुरू करवाया, जो रस्सी की जरीब से अधिक सटीक थी।
भूमि का वर्गीकरण (Classification of Land): भूमि को उसकी उर्वरता के आधार पर चार श्रेणियों में विभाजित किया गया था:
पोलज: जिस पर हर साल खेती होती थी।
परौती: जिसे एक या दो साल के लिए परती छोड़ा जाता था।
चाचर: जिसे तीन या चार साल के लिए परती छोड़ा जाता था।
बंजर: जिस पर पाँच या अधिक वर्षों से खेती नहीं हुई थी।
राजस्व का निर्धारण (Fixation of Revenue):
अकबर ने दहसाला प्रणाली (या ज़ब्ती प्रणाली) लागू की, जिसे राजा टोडरमल ने विकसित किया था।
इस प्रणाली के तहत, प्रत्येक फसल के लिए पिछले दस वर्षों के औसत उत्पादन और औसत मूल्य की गणना की जाती थी।
इस औसत का एक-तिहाई (1/3) हिस्सा भू-राजस्व के रूप में निर्धारित किया जाता था।
राजस्व की वसूली (Collection of Revenue): राजस्व नकद या फसल के रूप में चुकाया जा सकता था, लेकिन राज्य नकद वसूली को प्राथमिकता देता था। राजस्व वसूली के लिए 'अमलगुजार' जैसे अधिकारी नियुक्त किए जाते थे।