क्योटो प्रोटोकॉल को UNFCCC से जोड़कर समझाएं और "साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों" के सिद्धांत का उल्लेख अवश्य करें, क्योंकि यह इसकी एक प्रमुख विशेषता है।
क्योटो प्रोटोकॉल एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिसे 1992 के संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) का विस्तार करने के लिए अपनाया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य वैश्विक ऊष्मन (Global Warming) के लिए जिम्मेदार ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाना है। मुख्य बिंदु:
स्वीकृति: इसे 11 दिसंबर, 1997 को क्योटो, जापान में अपनाया गया और यह 16 फरवरी, 2005 को लागू हुआ।
उद्देश्य: प्रोटोकॉल ने भाग लेने वाले विकसित देशों के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित किए।
सिद्धांत: यह "साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों" (common but differentiated responsibilities) के सिद्धांत पर आधारित था। इसका अर्थ है कि ग्लोबल वार्मिंग से निपटने की जिम्मेदारी सभी देशों की है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से अधिक उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार विकसित देशों को उत्सर्जन में कमी के लिए बड़ी जिम्मेदारी उठानी चाहिए।