‘जुलूस’ पाठ में यह पीड़ा व्यक्त की गई है कि किसान अथक परिश्रम के बावजूद अपनी आजीविका के लिए संघर्षरत रहता है। इसी मानसिकता के कारण आज के युवा खेती-बाड़ी की अनिश्चितता और आर्थिक संकटों से ऊबकर नौकरी की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
खेती में मौसम, बाजार, लागत और समर्थन मूल्य जैसे अनगिनत जोखिम होते हैं, जबकि नौकरी में निश्चित वेतन, सामाजिक प्रतिष्ठा और शहरी जीवन का आकर्षण है। यही कारण है कि गाँवों से पलायन और कृषि से दूरी बढ़ती जा रही है।
इस प्रवृत्ति को कम करने के लिए खेती को लाभकारी और सम्मानजनक बनाना आवश्यक है। किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण, उचित मूल्य, सिंचाई, भंडारण और विपणन की सुविधाएँ मिलनी चाहिए। साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित उद्योगों और स्वरोज़गार को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।