यह गद्यांश महाभारत के प्रसंग से लिया गया है जिसमें अक्रूर भगवान कृष्ण से मिलने मथुरा जा रहे होते हैं।
जब दोपहर में अक्रूर का रथ यमुना तट पर पहुँचा, तो उन्होंने कृष्ण की अनुमति से पवित्र यमुना जल में स्नान किया। स्नान करने के बाद वे ईश्वर का चिंतन करने लगे। तभी उन्हें जल में अद्भुत दृश्य दिखाई दिया — उन्होंने देखा कि श्री बलराम और श्रीकृष्ण जल में ही एक सहस्र सर्पमुखों से युक्त शेषनाग पर विराजमान हैं।
उनके शरीर पर पीताम्बर और रत्नजटित मालाएँ शोभा बढ़ा रही थीं। श्रीकृष्ण के रूप में उन्हें भगवान विष्णु का साक्षात् दर्शन हुआ, जिनकी गोद में बलराम विराजमान थे। वहाँ असंख्य ऋषि और मुनि उनकी आराधना कर रहे थे।
अक्रूर को आश्चर्य हुआ कि श्रीकृष्ण और बलराम इतने शीघ्र वहाँ कैसे पहुँचे। जब वे जल की सतह पर ऊपर आए तो देखा कि कृष्ण और बलराम रथ पर आसीन हैं। इस अद्भुत अनुभव से अक्रूर भाव-विभोर होकर भगवान कृष्ण की स्तुति करने लगे।